बांझपन (Infertility) एक ऐसी समस्या है जिससे कई जोड़े जूझते हैं। इसे तब माना जाता है जब नियमित रूप से बिना गर्भनिरोधक के संबंध बनाने के एक साल बाद भी गर्भधारण न हो। हालांकि, बांझपन का प्रभावी इलाज संभव है, लेकिन सबसे पहले इसके कारणों का पता लगाना ज़रूरी है। यहीं पर फर्टिलिटी टेस्टिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
फर्टिलिटी टेस्टिंग क्या है?
बांझपन का इलाज शुरू करने से पहले फर्टिलिटी टेस्टिंग की सलाह दी जा सकती है। यह उन संभावित समस्याओं का पता लगाने का एक तरीका है, जो किसी जोड़े को गर्भधारण करने में परेशानी का कारण बन सकती हैं। फर्टिलिटी टेस्ट पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए किए जाते हैं। जांच की प्रक्रिया दोनों पार्टनर के मेडिकल इतिहास, जीवनशैली और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी जानने से शुरू होती है। इसके बाद जरूरत के अनुसार कुछ अन्य टेस्ट किए जाते हैं।
फर्टिलिटी टेस्ट के प्रकार
ब्लड टेस्ट
ब्लड टेस्ट फर्टिलिटी की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। इसके नतीजों से डॉक्टर को हार्मोन के स्तर और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ स्थितियों के बारे में जानकारी मिल सकती है। जरूरत पड़ने पर कुछ संक्रमणों की भी जांच की जा सकती है। महिलाओं में मासिक धर्म चक्र और ओव्यूलेशन से जुड़ी जानकारी के लिए भी कुछ ब्लड टेस्ट किए जा सकते हैं।
पेल्विक टेस्ट
इस जांच के दौरान डॉक्टर महिला के प्रजनन अंगों की जांच करते हैं और ऐसी किसी भी असामान्यता का पता लगाने की कोशिश करते हैं, जो गर्भधारण में परेशानी का कारण बन सकती है।
सीमेन एनालिसिस (वीर्य की जांच)
इस जांच में वीर्य के नमूने के जरिए स्पर्म की संख्या, गुणवत्ता और गतिशीलता (Motility) का आकलन किया जाता है। यह पुरुषों में फर्टिलिटी की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बेसल बॉडी टेम्परेचर (BBT) चार्टिंग
BBT चार्टिंग ओव्यूलेशन को ट्रैक करने के लिए महिला के बेसल बॉडी टेम्परेचर (BBT) को नियमित रूप से रिकॉर्ड करने का एक तरीका है। तापमान आमतौर पर सुबह उठने के तुरंत बाद और किसी भी शारीरिक गतिविधि से पहले लिया जाता है। ओव्यूलेशन के बाद शरीर के बेसल तापमान में हल्की बढ़ोतरी देखी जा सकती है, इसलिए BBT चार्टिंग से ओव्यूलेशन के पैटर्न को समझने में मदद मिल सकती है।
पोस्ट-कोइटल टेस्ट
इस टेस्ट में जोड़े को संबंध बनाने के कुछ घंटों बाद डॉक्टर के पास आने के लिए कहा जा सकता है। इसके बाद डॉक्टर सर्विकल म्यूकस (गर्भाशय ग्रीवा के स्राव) का सैंपल लेते हैं। इसका उद्देश्य यह देखना होता है कि सर्विकल म्यूकस में स्पर्म मौजूद हैं या नहीं और उनकी स्थिति कैसी है।
ट्रांसवेजाइनल (पेल्विक) अल्ट्रासाउंड
डॉक्टर जरूरत के अनुसार ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं। इस स्कैन से गर्भाशय और अंडाशय (Ovaries) की बनावट को देखने और उनमें होने वाले बदलावों का आकलन करने में मदद मिलती है। इससे डॉक्टर यह भी देख सकते हैं कि एक या दोनों अंडाशयों में फॉलिकल्स (Follicles) सामान्य रूप से विकसित हो रहे हैं या नहीं। इस जांच का समय इस बात पर निर्भर करता है कि डॉक्टर किस चीज़ का आकलन करना चाहते हैं।
हिस्टेरोसाल्पिंगोग्राम या HSG
इस प्रक्रिया के दौरान, योनि (Vagina) और सर्विक्स (Cervix) के जरिए गर्भाशय (Uterus) में एक कॉन्ट्रास्ट फ्लूइड डाला जाता है। इसके बाद एक्स-रे इमेज की मदद से गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब्स को देखा जाता है। इस टेस्ट का मुख्य उद्देश्य फैलोपियन ट्यूब्स में किसी संभावित रुकावट का पता लगाना और गर्भाशय की बनावट से जुड़ी किसी असामान्यता की जांच करना होता है।



